व्यथा महसूस कराती “सरजूपार की मोनालिसा”

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रायपुर। अकादमी निमोरा में प्रशिक्षु अधिकारियों के साँस्कृतिक आयोजन के मंच पर अभिनट द्वारा ‘कविता रंग आप संग’ अभियान के अन्तर्गत अदम गोंड़वी की बहुचर्चित कविता ” मैं च… की गलियों तक ले चलूँगा आपको…” का दृश्यपाठ “सरजूपार की मोनालिसा” प्रस्तुत किया गया।
अकादमी के प्राध्यापक सुभाष मिश्र के आमंत्रण पर संजीव मुखर्जी अभिनीत और योग मिश्र द्वारा निर्देशित यह कविता अदम गोंड़वीं के बगावती तेवर में कही गई सच्ची घटना है। अदम गोंड़वी एक पल में ही अपनी कविता से सारी व्यवस्था को बदल देना चाहते हैं। उनकी कविताएं ग़रीब और दबे-कुचले, अंतिम पंक्ति में सबसे पीछे खड़े आम आदमी का हथियार हैं।
उनकी यह बड़ी मशहूर कविता है, जो एक दलित लड़की से रेप और अन्याय की सच्ची घटना पर आधारित है। इस कविता में अदम गोंड़वी ने रेप पीड़िता की खूबसूरती बयान करने के लिए उसे ‘सरजू पार की मोनालीसा’ कहा है।
कविता के दृश्यपाठ में कुछ असंसदीय मान लिए गए शब्दों को बदल दिया है, मसलन जाति सूचक शब्द की जगह मलेच्छ और दबंग कर लिया है। बहुत लोग पूछते हैं कि हम इसे कविता का मंचन क्यों नहीं कहते? जवाब है कि हम इसे कविता का दृश्यपाठ इसलिए कहते हैं या करते हैं कि कविता का मजा और पैनापन मंच पर उसी तरह बरकरार रहे जैसा कविता में है।
गीत, संगीत और खूबसूरत दृश्य विन्यास का इस्तेमाल भी कविता के दृश्यपाठ में नहीं करना चाहिये, क्योंकि इससे कविता की मूल बातों से देखने-सुनने वालों का ध्यान हटता चला जाता है। कविता के दृश्यपाठ का मूल मकसद देखने-सुनने वालों की सोच में कविता की मूल भावना व विचारों को प्रक्षेपित करना है।
कविता सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं विचार के लिए होती है। दृश्यपाठ देखने वालों के लिए कविता सोचने विचारने का एक अवसर है।
इस प्रस्तुति को देखने के बाद एक महिला अधिकारी ने कहा “हमें सुभाष सर ने यह कविता पहले पढ़ाई थी पर देखने के बाद हमें अब समझ में आई और महसूस हुआ कि हम अपने घर में स्कूल, कालेज, दफ्तर में कितने प्रोटेक्टिव लाईफ जी रहे हैं। और इसी देश में कोई स्त्री कितना असुरक्षित जीवन बिता रही है। हम इस प्रस्तुति को देखने के पहले भी यह सब सुनते-पढ़ते जरूर रहे हैं पर आज हम उस दर्द को, उस स्त्री की बेबसी को, उसके साथ हुए अन्याय को घटता हुआ महसूस कर पाए।” यह कविता के दृश्यपाठ की सफलता मुझे लगती है।
‘सरजूपार की मोनालिसा’ की व्यथा आप भी निश्चित महसूस कर सकेंगे यदि आप रूबरू देखेंगे “सरजूपार की मोनालिसा”।
जमाना जरूर बदल सकता है यदि थोड़ा हम बदल सकें। एक स्त्री किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ बड़ी हिम्मत से साहस जुटाती है तभी अपने शोषण का प्रतिरोध कर पाती है। पर क्या हम हिम्म्मत जुटा पाते हैं कभी उसे न्याय दिलाने में उसका साथ देने या उन प्रभावशाली लोगों के खिलाफ जरा सा अपना मुँह तक खोलने का? हम तो उल्टे उस स्त्री पर ही झूठे आरोप मढ़ने उसे डराने धमकाने के प्रयास में लग जाते हैं। प्रभावशाली की अनुकम्पा की चाहत में जाने क्या-क्या करते, कहते स्त्री को लज्जित करते हैं।
यकीनन, यह नाटक eye opener लगी।

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