जानिए, आबकारी परिसर में कैसे विराजे आबकारेश्वर महादेव

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खण्डवा। नशे का व्यापार करने वाली सरकारी एजेंसी आबकारी विभाग के परिसर में महादेव मंदिर की स्थापना अचरज भरी खबर तो है, लेकिन पूरी तरह सच भी। आबकारी विभाग परिसर से लगे होने के कारण ही नाम पड़ा- आबकारेश्वर महादेव मन्दिर।
यह मंदिर मध्यप्रदेश के खण्डवा शहर में स्थित है। खण्डवा शहर स्व. किशोर कुमार और शांतनु(शान) जैसे सिंगर्स की बचपन का गवाह रहा है, इसलिए सब खण्डवा को जानते हैं।  लेकिन यह शहर मंदिरों के लिए भी भारतवर्ष में विख्यात है। यहां अनगिनत मन्दिर हैं। सुविख्यात दादाजी धूनी वाले का धाम, रामेश्वरम, नवचंडी मन्दिर आदि यहीं स्थित हैं।
इन्ही में शुमार है- आबकारेश्वर मंदिर। सावन के महीने में जिस तरह अन्य मंदिरों में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है, उसी तरह आबकारेश्वर महादेव मंदिर में भी भीड़ है।
आबकारेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना कब और कैसे हुई? इसकी पड़ताल The Voices ने की। आप भी जानिए, वो कौन सी परिस्थिति थी, जिसके कारण यहां आबकारेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना हुई।
इस स्थान को खण्डवा शहर में आम बोलचाल की भाषा में गांजा गोदाम के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यहां आबकारी विभाग का जिला स्तरीय दफ्तर होने के साथ-साथ गोदाम भी है।
लगभग 12 साल पहले खण्डवा नगर निगम द्वारा अतिक्रमण हटाया गया था। अतिक्रमण के दायरे में मायाराम विरले का पान ठेला भी आ गया था। सरकारी फरमान था, सो मायाराम को भी अपना ठेला हटाना पड़ा।
ठेला हटाने के बाद जगह खाली हो गयी, और वहां झाड़ियां उग आईं। उन दिनों स्वच्छता अभियान का ऐसा वातावरण नही था, जैसा आज है। सो, लोग-बाग उस झाड़ी के पीछे लघु शंका करने लगे।
चूंकि, यह स्थान आबकारी विभाग के मेन गेट से बिल्कुल लगा हुआ है, इसलिए आबकारी दफ्तर में काम करने वाले लोग गंदगी और बदबू से परेशान होने लगे। खासकर यहां की महिलाकर्मी ज्यादा परेशान थीं। क्योंकि लघु शंका करने वालों की कोई टाइम-टेबल नही होती।
अपना ठेला हटाकर जगह खाली करने वाले मायाराम विरले को तब भी उस जगह से लगाव था, और वहां हमेशा आने-जाने वाले लोगों से भी।
कर्मचारियों ने मायाराम से कहा, कि यहां कुछ ऐसा करो, कि लोग लघु शंका ना करें। काफी सोच विचार के बाद मायाराम ने उस स्थान की सफाई की, फिर महादेव की मूर्ति प्रतिष्ठापित कर दी। इस काम में उनके दोस्त रामभरोस राठौर ने भरपूर सहयोग दिया।
रामभरोस राठौर और मायाराम विरले
आबकारी विभाग के कर्मियों को भी मायाराम और रामभरोस की यह तरकीब अच्छी लगी। सो, विभाग के लोगों ने आपसी सहयोग से यहां लोहे की जाली का घेरा और छत लगवा दी। खण्डवा के पेंटर संतोष फुलझाली ने सजाने- संवारने में अपना योगदान दिया। इसके बाद नाम दिया गया- आबकारेश्वर महादेव मंदिर।
आबकारेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मायाराम अब इलेक्ट्रीशियन का काम करते हैं और रामभरोस की अनाज की दुकान हैं। दोनों कई पीढ़ियों से खण्डवा के ही निवासी हैं। 12 साल पहले की गई उनकी पहल की आज हर कोई तारीफ करता है।
The Voices से बातचीत करते हुए मायाराम और रामभरोस ने कहा, हमको तो अंदाज़ा भी नही था, कि आगे चलकर यह मंदिर इतना ख्याति अर्जित करेगा। हमने तो लोगों को यहां लघुशंका से रोकने और कर्मचारी भाई-बहनों को उनकी हर दिन की मुश्किलों से निजात दिलाने के लिए यह पहल की थी। लेकिन, आज आबकारेश्वर महादेव मंदिर को आस्था के केंद्र के रूप में देख कर खुशी होती है।

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