By रतन लाल डांगी
योग्यता मापने का पैमाना क्या हो ?
हम सभी जानते हैं कि परीक्षा में प्राप्तांकों के प्रतिशत एवं साक्षात्कार में ‘भाषा ज्ञान के योग्यता की अवधारणा अत्यन्त त्रुटिपूर्ण एवं अतार्किक है।’
यह स्थापित तथ्य है कि किसी भी परीक्षा में अंक अनेक आधारों पर या कारणों से प्राप्त किए जा सकते हैं । भाषा ज्ञान भी विशिष्ट सामाजिक परिवेश एवं सामाजिक पृष्ठभूमि की परिचायक है। इस क्रम में हमें समझना होगा कि हमें परीक्षा में अंक केवल हमारी मेहनत पर नहीं मिलते। अंक मिलने के कई और कारण हो सकते हैं।
किसी छात्र के पास सरकारी स्कूल था और उसका टीचर भी नहीं आता था और न ही उसके घर में कोई पढ़ा लिखा था। उसके पास किताब भी नहीं थी।उस बच्चे के पिता के पास ना ही इतने पैसे थे कि वह ट्यूशन भी लगा पाता। वह पहले स्कूल जाता फिर अपने घर में जी तोड़ मेहनत करता। आने जाने में ही उसे तीन-चार घण्टे लग जाते । अगर मास्टर से वह प्रश्न पूछता तो उसे डांट खानी पड़ती। इतना ही नहीं उसके सहपाठी भी उससे ठीक व्यवहार नही करते। अब ऐसे सामाजिक एवं शैक्षणिक परिवेश में उसके परीक्षा में कॉनवेन्ट में पढ़ने वाले बच्चे के बराबर कैसे आएंगे ।
जिस बच्चे के पास शिक्षा की पीढ़ियों की विरासत है। पूरी की पूरी सांस्कृतिक पूंजी भी उसके पास है। अच्छा स्कूल अच्छे मास्टर, अच्छी किताबें पढ़े लिखे मां-बाप भाई-बहन रिश्तेदार नातेदार एवं पढ़े लिखे ‘पड़ोसी, दोस्त एवं मोहल्ला।
स्कूल जाने के लिए कार या बस, स्कूल के बाद ट्यूशन या मां बाप का पढ़ने में सहयोग। घर में उसका सारा समय या तो पढ़ने या फिर अपने खेल में ही लग जाता है। यह छात्र घर में पानी भी मांग कर पीता है। क्या ऐसी दो विपरीत परिस्थितियों वाले छात्रों के मध्य परीक्षा में प्राप्तांक ‘योग्यता’ का निर्धारण कर सकते हैं।
यह तो होगा ही कि कान्वेन्ट में पढ़ने वाले बच्चे को ऐसे पिछड़े क्षेत्र के सामान्य स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों से इम्तिहान में अधिक अंक मिलेंगे? अगर मान लीजिये कान्वेंट वाले बच्चे को 60 प्रतिशत अंक मिलते हैं और पिछड़े क्षेत्र के सामान्य स्कूल के बच्चे को 50 प्रतिशत अंक मिलते हैं हम किसे योग्य मानेंगे ?
उस बच्चे की बंचना तथा नकारात्मक सामाजिक परिवेश के खिलाफ लड़ने की क्षमता के अंक उसके परीक्षा में नही जुड़ने चाहिएं। और जुड़ने चाहिए तो कितना प्रतिशत।जब तक ऐसा कोई पैमाना नही विकसित किया जाएगा तब तक परीक्षा में प्राप्तांकों के आधार पर योग्यता का निर्धारण न्याय नही है।

 

रतन लाल डांगी वरिष्ठ IPS अधिकारी हैं और वर्तमान में छत्तीसगढ़ के कांकेर में DIG के रूप में पदस्थ हैं.

1 COMMENT

  1. उम्दा लेख। बहुस्तरीय और गैर सामाजिक- आर्थिक बराबरी वाली व्यवस्था में प्राप्तांकों के आधार पर प्रतिभा के आकलन की प्रक्रिया दोषपूर्ण है।
    गांव का बच्चा अंग्रेजी में बात नही कर सकता या चलन के हिसाब से स्मार्ट नही है पर वह तैरना जानता है, खेत मे अन्न उपजाना जानता है, प्रकृति को कम नुकसान पहुंचाता है, जड़ी बूटियों को पहचानता है तो स्कूली पाठ्यक्रम में कम अंक लाना किसी भी लिहाज से उसे कमतर नही करतीं।
    हमारी शैक्षिक व्यवस्था को यह फर्क समझना होगा।
    रतन सर को नमस्कार और शुक्रिया इस बेहतर लेख के लिए।

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