कर्नाटक चुनाव : ये है हजारों संत के 400 मठ वाले लिंगायत समुदाय का रहस्य

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चुनाव डेस्क। अलग धर्म की मांग कर रहे एक खास समुदाय के ईर्द-गिर्द ही कर्नाटक राजनीति का ताना-बाना बुना होता है। कर्नाटक चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर एक समुदाय का नाम सुर्खियों में ला दिया है वो है लिंगायत। कर्नाटक की कुल आबादी का 17% हिस्सा लिंगायत का है। लिंगायत समुदाय एक समाज सुधार आंदोलन से बना है। 12वीं शताब्दी में ब्राह्मण परिवार में जन्मे बासवन्ना ने हिंदु समाज की कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था और उसी समय उन्होंने लिंगायत समुदाय की स्थापना की थी। ये वैदिक धर्म को ना मानने वाला एक समुदाय है।
लिंगायत समुदाय की परंपरा हिंदुओं से अलग है। ये समुदाय अपने इष्टलिंग को मानता है, जिसे इसको मानने वाले लोग हमेशा अपने शरीर से बांधकर रखते हैं। ये इष्टलिंग अंडाकार होता है। जिसे रुद्राक्ष की माला में या साधारण धागे के साथ बांधकर रखते हैं। ये समुदाय मूर्ति पूजा को भी नहीं मानता है। इस समुदाय का मानना है कि ये इष्ट लिंग ही इनकी आंतरिक चेतना का प्रतीक है। इसी से सारी सृष्टि की रचना हुई है।
हिंदुओं की तरह लिंगायत समुदाय पुर्नजन्म में विश्वास नहीं रखता है। इनका मानना है कि मानव जीवन एक ही बार मिलता है और इसी में अपने कर्मों से स्वर्ग या नर्क पाया जा सकता है। ये समुदाय उन्हीं बातों को मानता है जो 12वीं शताब्दी में बासवन्ना ने तय की थी। उन्हीं के बनाए नियमों को मानता है।
लिंगायत समुदाय का कर्नाटक में कितना वर्चस्व है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 30 जिलों वाले राज्य में 400 लिंगायत मठ हैं। ये मठ ही यहां कि राजनीतिक धारा को नियंत्रित करते हैं। लिंगायत ही कर्नाटक के चुनावी नक्शे की धुरी रहे हैं।

जिस पार्टी को अपना समर्थन दिया है वो सत्ता में आई

वैसे लिंगायत पारंपरिक रुप से बीजेपी के वोटर रहे हैं लेकिन इस समुदाय ने जिस पार्टी को अपना समर्थन दिया है वो सत्ता में आई है। 80 के दशक में जनता दल के नेता रामकृष्ण हेगड़े को समर्थन दिया था। 1989 में कांग्रेस के वीरेंद्र पाटील को समर्थन दिया। तब कांग्रेस ने सरकार बनाई थी। 2008 में अपने ही समुदाय के बी.एस. येदियुरप्पा को समर्थन देकर बीजेपी को सरकार में ला दिया। 2013 में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते येदियुरप्पा को को बीजेपी से निकाला गया तो लिंगायतों ने कांग्रेस के सिद्धारमैया को अपना समर्थन दे दिया। 2018 में येदिरप्पा ने कर्नाटक में वापसी की तो नतीजे उनके पक्ष में आ गए।

अंतिम संस्कार की परंपरा है कुछ अलग

लिंगायत अपने समुदाय के मृत लोगों को हिंदुओं की तरह जलाते नहीं हैं। वे उन्हें दफनाते हैं। शव को एक कुर्सी पर बैठाकर उसे रस्सी या कपड़ों से बांधा जाता है। इसके पहले शव को नहला कर गहने और नए कपड़े भी पहनाए जाते हैं। इस कुर्सी को शवयात्रा के समय लोग कांधों पर उठाते हैं। इसे इस समुदाय में विमान सजाना कहते हैं। फिर शव को अंतिम संस्कार वाली जगह ले जाकर इसी अवस्था में दफना दिया जाता है।

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